Friday, 6 April, 2007

हम करें राष्ट्र आराधन


हम करें राष्ट्र आराधन...आराधन ॥२॥

तन से मन से धन से
तन मन धन जीवन से
हम करें राष्ट्र आराधन...आराधन
अंतर से मुख से कृति से
निश्‍छल हो निर्मल मति से
श्रद्धा से मस्तक नत से
हम करें राष्ट्र अभिवादन...अभिवादन

हम करें राष्ट्र आराधन - ४
तन से मन से धन से
तन मन धन जीवन से
हम करें राष्ट्र आराधन - ३
आराधन...करें राष्ट्र आराधन

अंतर से मुख से कृति से
निश्‍छल हो निर्मल मति से ॥२॥
श्रद्धा से मस्तक नत से
हम करें राष्ट्र अभिवादन - २
हम करें राष्ट्र आराधन - २
आराधन...हम करें राष्ट्र आराधन

अपने हँसते शैशव से
अपने खिलते यौवन से ॥२॥
प्रौढ़ता पूर्ण जीवन से
हम करें राष्ट्र का अर्चन - २
हम करें राष्ट्र आराधन - २
आराधन...हम करें राष्ट्र आराधन

अपने अतीत को पढ़कर
अपना इतिहास उलटकर ॥२॥
अपना भवितव्य समझकर
हम करें राष्ट्र का चिंतन - २
हम करें राष्ट्र आराधन - २
आराधन...हम करें राष्ट्र आराधन

है याद हमे युग-युग की
जलती अनेक घटनाऐं
जो माँ की सेवा पथ पर
आई बनकर विपदाऐं
हमनें अभिषेक किया था
जननी का अरि शोणित से
हमने शृंगार किया था
माता का अरिमुंडो से
हमने ही उसे दिया था
सांस्‍कृतिक ऊच्च सिंहांसन
माँ जिस पर बैठी सुख से
करती थी जग का शासन
अब काल-चक्र की गति से
वह टूट गया सिंहांसन
अपना तन मन धन देकर
हम करें राष्ट्र आराधन - ४
तन से मन से धन से
तन मन धन जीवन से
हम करें राष्ट्र आराधन - ३
आराधन...हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन - ३

Hum Kare Rashtra A...


यहाँ से डाऊनलोड करें।

Saturday, 24 February, 2007

अभासी पुस्तकालय (LibraryThing)

कुछ दिनों पहले ही जीतू जी ने शेलफारी से परिचय कराया था और अपनी पुस्तकों की सूची से दिखाई थी। उससे कुछ ही दिनों पहले मैनें भी लाईब्रेरीथिंग पर अपनी पुस्तक की अलमारी सजाई थी। इन दोनों के बारे में और जानकारी प्राप्त करने के चक्कर में मैनें इधर-उधर हाथ-पैर मारे तो पता चला कि इस क्षेत्र में इन दोनो के अलावा लगभग पच्चीस ओर विकल्प हैं जिनमें से लाईब्रेरीथिंग, शेलफारी, लिस्टाल, गुरूलिब मुख्यतः प्रसिद्ध हैं। एक नई जानकारी तो ये मिली इस इस तरह की सेवा को सामाजिक नामावली सेवा यानि Social Cataloging Service कहते हैं। जिस तरह यूट्यूब ने वीडीयों के मामलें में, डिग ने समाचार के मामलें में, और फ्लिकर ने तस्वीरों के मामलें में उपयोगकर्ताओं को ना ही अपने सामान रखने की जगह दी है बल्कि एक-दूसरे से जोड़ कर समुदायिकता फैलाई है, उसी तरह नामावली सेवाऐं उपयोगकर्ताओं को अंतर्जाल पर अपनी किताबें, संगीतों व फिल्मों की सूची बनाने और व्यवस्थित करने के साथ-साथ उनकी पसंद को बांटने वालों से उनका परिचय कराती हैं। इस लेख में मैं केवल किताबें व्यवस्थित करने वाली सेवाऐं से संदर्भ रखूँगा।

सभी लेखों को पढ़कार व खुद प्रयोग कर मुझे लाईब्रेरीथिंग ही बेहतर विकल्प लगा क्योंकि:


  • इसका समुदाय बहुत बढ़ा है जिससे पुस्तक पर प्रतिक्रिया व पसंद की पुस्तकों के मिलाप की संभावना व शुद्धता ज्यादा होती है।
  • इसमें हर पुस्तक का अलग पन्ना है, साथ ही हर लेखक व हर टैग (tag) का अलग पन्ना है।
  • इसका इंटरफेस सरल है और एक ही पन्ने पर अपने पुस्तकालय को देखने, आंकलन करने, समीक्षा लिखने, पुस्तक की जानकारी बदलनें, इत्यादि की आसानी रहती है। देखने के लिये पाँच अलग-अलग क्रम में कॉलम जमा सकते हैं। शेलफारी पर यही बड़ी कमी थी, समीक्षा व आंकलन के लिये हर किताब पर अलग से जाना पड़ता है।
  • यह विश्व की कई पुस्तकालयों से जुड़ी है जिससे किताब का मिलना आसान है।
  • अपने पुस्तकालय को अपने कंप्यूटर पर डाऊनलोड व अपलोड आसान है।
  • इसके साथ की कई मजेदार टूल हैं जैसे अपने सारे कवर पन्ने एक साथ देखना, लेखकों की तस्वीरों, संपूर्ण उपयोगकर्ताओं का लेखक व टैग क्लाऊड (tag cloud), सभी की रैटिंग का चित्रातमक प्रस्तुति, कई मैंलिंग लिस्ट, समुदाय, सांख्याकि पन्ना

लाईब्रेरीथिंग की सबसे बड़ी कमी है कि इसमें सिर्फ २०० किताबों की सूची बना सकते हैं और अतिरिक्त के लिये $२५ की प्रीमियम सदस्यता लेनी पड़ती है। मैने शेलफारी और लिस्टाल दोनों पर खाता खोला पर मुझे यही सबसे बेहतर लगी और कई रोचक पुस्तकों की सिफारिशें भी प्राप्त हुई। वैसे भी अभी तो ८८ किताबें हीं है तो काफी समय है अलमारी भरने में। जब भरेगी तब सोचेगें, अन्यथा दूसरा निःशुल्क खाता तो खोल ही सकते हैं। इस चिठ्ठे पर दाई और जो पुस्तकों की सूची (पुरालेख के नीचे) देख रहें हैं वो भी वहां के विजेट्स से बनाई है। वैसे इन सेवाओं पर हिन्दी की किताबें रखने की सुविधा उपलब्ध नहीं है क्योंकि हिन्दी की किताबों का जाल पर कोई डाटाबेस नही है। अभी लगता भी नही कि किसी समय शीघ्र ही यह सुविधा मिलेगी।

अधिक जानकारी के लिये (टिप्पणियाँ भी देखें):
techcrunch, librarytwopointzero, fadetheory

मेरी लाईब्रेरी

(यह पहला तकनीकी लेख है इस पन्ने पर अतः आधा अंग्रेजी में होने के लिये मुआफ़ करना :)

Thursday, 22 February, 2007

कोई आपको लूटे तो...

अगर कोई आप से किसी सामाग्री की अधिकतम खुदरा मूल्य से ज्यादा कीमत माँगे तो आपके पास एक साधन है: भारत सरकार का नाप-तौल विभाग। कथित रूप से बिना रसीद की जरूरत के की हुई शिकायत, जिसमें आपकी पहचान को गुप्त रखा जाएगा, को दस दिन के अंदर हल किया जाने का प्रावधान है। दूरभाष क्रमांक, ई-मेल पते व अधिक जानकारी के लिये "द हिन्दु" का ये समाचार देखें। लगता है कि संपर्क सूत्र कर्नाटक के लिये ही दिये गये हैं पर ऐसा विभाग हर राज्य में होना चाहिये। ये भी पता नही की प्रावधानों के बावजूद कुछ होता है भी या नही। किसी का अनुभव हो तो जरूर बाँटियेगा। मैने एक बार तो दिल्ली हवाईअड्डे के अंदर पानी बोतल के ५० रूपये दिये थे पर उस समय ये पता नही था। अब देखता हूँ किसी से पंगा लेने का मूड बनता है तो।

और हाँ एक बंगलोर निवासी स्थानीय डेयरी के कर्मचारी द्वारा एम.आर.पी. से ज्यादा माँगने के विरोध में मामला पुलिस व उपभोक्ता मंडल तक खींच चुके हैं। इस तरह के मामले में क्या होता है और क्यों हमे 'चलता' है से हटकर कुछ करने का प्रयास करना चाहिये यदि ये जानने के इच्छुक हों तो उनका ये चिठ्ठा देख सकते हैं। इस तरह की तंत्र से लड़ने की इच्छा व धैर्य विरल ही होता है तो किसी का पढ़कर थोड़ी हिम्मत भी बढ़ती है।

Wednesday, 21 February, 2007

मेरा भी चोरी हो गया!

ढोल-नगाड़े-ड्रम-तालियाँ....

देविओं और सज्जनों मुझे ये कहते हुऐ हर्ष(?) हो रहा है कि आज से मैं भी (हिन्दी) चिठ्‍ठा जगत में आधिकारिक रूप से प्रवेश कर गया हूँ और चापलूसी द्वारा सम्मानित किया गया हूँ। औरंगाबाद बिहार के समझदार, मजेदार, यहाँ तक कि "मेहनती" और "सृजनात्मक", प्रशांत कुमार ने मेरे चिठ्‍ठे से चतुरायामी चलचित्रों वाली प्रविष्टी चुरा ली है! हांलाकि मेरे जालपष्ठ से एक चुटकुलों का पन्ना भी सीधा ही उठा लिया पर वो मेरे मौलिक नही थे बल्कि ई-मेल प्रत्याषित थे। खैर शीर्षक से लेकर प्रदर्शन तक लगता नही की प्रशांत बाबू ने ज्यादा दिमाग खर्च किया है।

वैसे मैने उन्हे rel=nofollow का उपयोग कर गूगल प्रेम देने में बढ़प्पन नहीं दिखाया है, ये बात अलग है कि मेरे पास देने के लिये शायद है भी नही।

उपलेख: इस बात से मुझे मेरे साईबर-जगत के मील के पत्थर याद आ गये। पहला मील का पत्थर वो था पहली बार अपनी बहुत ही घटिया वेबसाईट बनाई थी, दूसरा जब पहली बार गूगल पर मेरा नाम लेने पर मैं ही मिला, तीसरा देसी पंडित से दो बार जुड़ा गया*, और अब ये चौथा मील का पत्थर। अब भविष्य की और...पाँचवा तब जब कम से कम हज़ार लोग रोज़ आऐं मेरे पन्ने पर (जिस हिसाब से लिख रहा हूँ उस हिसाब से असंभव ही है पर सपने देखने में मेरा क्या जाता है!), छटा तब जब खुद का डोमेन नाम ले लूँ और सातवाँ जब अपने चिठ्ठे से पैसे कमाने लगूँ। इसके बाद तो सपनें भी नही सूझते।

*यह बात अलग है कि यह हिन्दी चिठ्‍ठे में हुआ जहाँ अन्य चिठ्‍ठों से प्रतिस्पर्धा तुलनात्मक रूप में काफी कम है!

Tuesday, 20 February, 2007

शारीरिक अखंडता व्याधि - बीमारियाँ कैसी-कैसी (भाग २)

गतांक से आगे --

प्रकृति की क्रूरता देखिये कि कुछ लोग एक शरीर में जन्म तो ले लेते हैं पर उस शरीर को अपना नही पाते। पारलैंगिंक (transsexual) व्यक्ति पुरूष/स्त्री के शरीर में जन्म लेने के बावजूद भी स्वयं को विपरीत लिंग का मानते हैं। यह उनके शरीर में खुद के शरीर की छवि की विकृति का प्रभाव हो, भ्रूणावस्था के समय असंतुलित मात्रा में विपरीत लिंग के हार्मोनो का प्रभाव, आनुवांशिक कारण हो या फिर अन्य कोई कारण - वे एक ना एक दिन स्वयं को अपने मानसिक लिंग में परिवर्तित करना पसंद करते ही हैं, यह बात अलग है कि कितनें संभव हो पाते हैं समाज व साधनों के बंधन के कारण। इसी तरह की बीमारी का एक रूप यह भी है कि लोग अपने संपूर्ण शरीर से संतुष्ट नही होते, बल्कि उनको वह शरीर उसी तरह गलत लगता है जैसे पारलैंगिको को अपना जन्म शरीर।

प्रस्तुत है शारीरिक संरचना पहचान व्याधि यानि Body Integrity Identity Disorder (बी.आई.आई.डी.)। इस व्याधि - क्या इसे बीमारी कहा जा सकता है यह खुद ही एक नाजुक मुद्दा हो सकता है - से ग्रसित इंसान अपने संपूर्ण शरीर को अपना नहीं पाता। मरीज़ को हमेशा अपने शरीर में परिवर्तन की ललक, पागलपन समझ लीजीये, होती है और बिना परिवर्तन के स्वयं असंतोष, तनाव, कम आत्मविश्‍वास, दुःख व मजबूरी की जिंदगी जीता है। क्या परिवर्तन करना चाहते हैं ये लोग? अधिकतर मामलों में बी.आई.आई.डी. के मरीज़ स्वयं को विकलांग बनाना चाहते हैं। शायद एक हाथ, या पैर, या दोनो, नही तो कम से कम एक ऊंगली तो जानी ही चाहिये। उसके बिना वे वे नही रहते। जब कुछ सप्ताह पहले पहली बार ये समाचार और इस बीमारी के बरे में पढ़ा तो पूरी खबर पढ़ने से पहले ऊबकाई आ गई। इस बीमारी की विचित्रता, ईश्वर की इस दुनिया की विडंबना और इसके मरीजों के दर्द की दास्तान वीभत्स कर देने वाली है।शायद एक हाथ, या पैर, या दोनो, नही तो कम से कम एक ऊंगली तो जानी ही चाहिये।

चूंकि अन्य लोगों के लिये इस बीमारी की कल्पना भी असंभव है, इस बीमारी के मरीज़ों को समाज अधिकतर पागल ही मानता है और ये लोग खुलकर सामने भी नही आ सकते। कई खुद ही हाथ-पैर बांध के विकलांगों की तरह जीकर अपने दोष को पोसते हैं तो कुछ स्वयं ही अपने अंग-भंग करने जैसे (गाड़ी के नीचे आकर) जघन्य कार्य करने को मजबूर हो जाते हैं। कुछ लोग हिम्मत कर चिकित्सकों को बतातें है तो भी अधिकतर उन्हें मानसिक चिकित्सा द्वारा इस भावना को दिमाग से निकालने के लिये भेज दिया जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि इस बीमारी को आज उसी तरह मानसिक द्वेष माना जा रहा है जिस तरह ऐतिहासिक रूप से समलैंगिगता को माना जाता रहा था। वे लोग आशा करते हैं कि समय के साथ इसे भी पागलपन की श्रेणी से दूर कर दिया जायेगा।

विकीपीडिया के अनुसार इस बीमारी के कारण अज्ञात हैं पर अनुमान लगाया जाता है कि या तो बचपन में किसी विकलांग को सहानुभुती पाता देखकर भावी मरीज़ों में अपूर्ण शरीर आदर्श बन जाता है। एक अन्य अंदेशा दिमाग की संरचना में कमी की वजह से एक अंग का शरीर से पृथक होना महसूस होना है। इसी कारण से बी.आई.आई.डी. के पीड़ित किस अंग को ठीक किस जगह से कटवाना है इस मामलें में बहुत कट्टर होते हैं।

ब्रितानी समाचारपत्र गार्डियन (guardian) में एक ऐसे ही मरीज की आत्मकथा छपी थी जिसे अपनी दोनो टांगे कटवाऐ बिना चैन नही मिला। पाँच वर्ष की उम्र से ही इस बीमारी की ग्रसित वे अपनी उम्र के तीसरे दशक तक इतनी पीड़ित हो गईं थी कि अपनी टांग कटवानें के प्रयास में मौत भी स्वीकार थी। और चूंकि चिकित्सक बिना कारण आपके कहे काटने से तो रहे तो उन्होने जानकर अपनी टांगों को बर्फ के ठंडे पानी में छः घंटे रखकर (वे खुद बेहोश हो गई) इतना सड़ा दिया कि डॉक्टरों को उनकी टांगे काटने के सिवाय कुछ चारा ही ना रहा। यह बात अलग है कि उनका ये प्रयास तीसरी बार में सफल हुआ और पहले के दो व चार घंटे का प्रयोग सिर्फ पैरों का गंदा घाव बन कर रह गया जिसे चिकित्सकों ने मेहनत कर फिर से, उनकी खुशी पर मरीज के दुःख के बावजूद, ठीक कर दिया।

वे कहती हैं कि वे टांगे जाने के बाद बहुत खुश और उत्साहित महसूस करती हैं और मैं इधर अपने बाल नोंच कर अकल्पनीय को कल्पित करने की असंभव कोशिश कर रहा हूँ।

Monday, 19 February, 2007

मैं जानता हूँ मगर सुनना नही चाहता

कई सामान्य बातें भी मेरे दिमाग में लंबे समय गुत्थी बन कर रह जाती हैं और अंत में बिना उत्तर के ही उनको 'ऐसा-ही-होता-है-जिसका-कोई-कारण-नहीं' के ढेर में डालना पड़ता है। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनको हम सभी जानते हैं पर फिर भी कोई दूसरा कह दे तो बहुत बुरा लगता है। क्यों होता है ऐसा? मेरा तार्किक दिमाग तो थक गया ये सोच-सोच कर। और मैं किसी बहस के नाजुक मुद्दे की बात भी नही कर रहा हूँ, बल्कि प्रतिदिन की बात है।

मुझे पता है कि अगर मैं किसी को सलाह दूँ तो वो मेरी सलाह मानने का जिम्मेदार नही। वो अपने हिसाब से खुद की समस्या को खुद की संतुष्टि के अनुसार सुलझायेगा भले ही मेरी सलाह को ध्यान में रखे। लेकिन क्यों फिर मैं किसी के मुँह से यह नही सुनना चाहता कि 'तुम्हें जो कहना है कहो, करूँगा तो वही जो मैं चाहूँ'? क्यों ऐसा सुनने पर मुझे हृदयाघात पहुँचता है?

मुझे पता है कि मैं मेरी कंपनी में पैसे के लिये अपना समय बेचता हूँ। इसके अलावा उनका मुझसे और मेरा उनसे - सहकर्मियों के साथ गैर-व्यवसाई संबंधों को छोड़कर - कोई लेना-देना नहीं। फिर क्यों मुझे अपने बॉस से ये सुनने पर बुरा लगता है कि अगर मैं मर भी जाऊँ तो भी उनके प्रोजेक्ट को निबटा के जाऊँ?

शायद जानकर के भी हम कड़वे सच को कम वज़न देने की कोशिश करते हैं और अन्य लोगों से पहचान और महत्व ढूढने की कोशिश करते हैं। अपने दिल को झूठीं साँत्वना देते हैं कि मैं जो कुछ करूँगा और कहूँगा उससे किसी को कुछ तो फर्क पड़ेगा। क्या दूसरे का यह कहना उस कड़वाहट को दुहरा कर उसे और मजबूत कर देता है? यदि नहीं, तो क्या दूसरे के द्वारा अपनी गल्ती दिखलाने से अपने औहदे को ठेस पहुँचती है और खुद के प्रति खुद के सम्मान में कमी आती है? क्या हमारी वास्तविक औकात हमारे झूठे स्वाभिमान से टकराकर आहत करती है?

इससे पहले कोई सज्जन मुझे ढांढस बंधाने की कोशिश करें, यह साफ कर देना चाहता हूँ कि इस प्रविष्टी का (इस चिठ्ठे की किसी प्रविष्टी का) मतलब ये नहीं कि मैं यहाँ दुःखी आत्मा बना बैठा हूँ।

Saturday, 17 February, 2007

रोजमर्रा के यंत्रो की डिजायन के पीछे का मनोविज्ञान

डोनाल्ड नोर्मन (Donald A Norman) की किताब "प्रतिदिन की वस्तुओं की अभिकल्पना" (Design of Everyday Things) हमारी रोज़मर्रा की वस्तुओं को एक परिकल्पना (design) विशेषज्ञ की नज़रों से प्रदर्शित करती है। किताब का मुख्य उद्देश्य वस्तुओं के निर्माण में अतकनीकी निर्णयों का महत्व व उन निर्णयों के फलस्वरूप उपयोगकर्ता और वस्तु के बीच उपयोग के दौरान होने वाला खिंचाव है जो कि वस्तु के साथ उपयोगकर्ता के अनुभव का बड़ा हिस्सा होता है। उदाहरणतः कितनी बार हम धक्का देकर खुलने वाले दरवाजे को खींचने की नाकाम कोशिश करते हैं, अथवा दूरभाष के साधारण से लक्षण (feature), जैसे कॉल-फॉरवार्डिंग (call forwarding), के उपयोग के लिये अनुदेश पुस्तिका (instruction manual) का सहारा लेते हैं। लेखक के अनुसार ये उस यंत्र की खराब परिकल्पना के कारण हैं जिसकी वजह से छोटी सी बातों के लिये भी हमें लंबी, जटिल और अप्राकृतिक प्रक्रिया का उपयोग करना पड़ता है। लेखक का यह मानना है, और मैं भी उनसे सहमत हूँ, कि दिन-प्रतिदिन हमारी सरल से सरल वस्तुऐं और यंत्र अनावश्यक रूप से जटिल होते जा रहे हैं क्योंकि हम खरीददार के रूप में और निर्माणकर्ता बनाने वाले के रूप में यंत्र की सरलता को रंग-रूप, कीमत और लक्षणों की भरमार के पीछे धकेलते जा रहें हैं। हर कोई ज्यादा से ज्यादा "फीचर्स" माँगता और परोसता है भले ही उपयोगकर्ता को ना ही उन "फीचर्स" की उपस्तिथी की जानकारी होती है और अगर होती है तो ना ही उनके उपयोग की आवश्यकता या उपयोग करने की प्रक्रिया का ज्ञान। डोनाल्ड नोर्मन ने इस पुस्तक में इस बात पर बल दिया है कि किस तरह हम उपकरणों की परिकल्पना उनके उपयोगकर्ता की मनोवृत्ति को ध्यान में रखकर कर सकतें हैं ताकि उपयोग के समय व्यर्थ का असंतोष ना हो।

किसी भी यंत्र की अभिकल्पना के दौरान निर्माणकर्ता का उद्देश्य होना चाहिये कि उसके उपयोग करने के समय किसी प्रकार की लिखित जानकारी या चिन्हों की जरूरत ना पढ़े, विशेषकर साधारण सी दैनिक काम आने वाले यंत्रो जैसे, दरवाज़े, नल, कॉफी बनाने की मशीन, कार, बिजली के बटन इत्यादि में। इसके लिये उपयोग के समय प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले प्राकृतिक संकेतो की उपस्थिती आवश्यक है। इन संकेतो को प्राकृतिक मानचित्र (mapping) का प्रयोग करना चाहिये ताकि कोई नियंत्रक वही काम करे जो उसे देखकर एक साधारण मानव को आशा हो। उदाहरणतः बटन को देखकर उपयोगकर्ता को प्राकृतिक रूप से दबाने की आशा होती है अतः कोई निर्माणकर्ता यदि बटन को दबाने की बजाय गोल घुमा कर उपयोग में लेने का आकांक्षित हो तो वह गलत परिकल्पना होगी। कुछ मानचित्र विश्वस्तरीय व प्रसिद्ध होते हैं जैसे की दायें-बायें बटन से यदि टेप की आवाज कम-ज्यादा करनी हो तो सभी दायें को बढ़ती आवाज की दिशा मानते हैं।जब हम काँच देखते हैं और बिगाड़ने का मन होता है तो मन में ख्‍याल आता है तोड़ दें

किसी पदार्थ को देखकर हमें जो करने की प्राकृतिक ललक होती है, उस भावना को लेखक पदार्थ का अफ्फोर्डेंस (affordance) बताते हुऐ कहते हैं कि किसी वस्तु के निर्माण में हमें उसमें उपयोग किये गये पदार्थ की अफ्पोर्डेंस का ध्यान रखा चाहिये। एक मनोरंजक उदाहरण के रूप में डोनाल्ड बताते हैं कि जब एक रैलवे-स्टेशन पर यात्रियों के बैठने के लिये बनी सीटों के चारों और काँच की दीवार बनाई गई तो असमाजिक तत्व रोज ही उस काँच को तोड़ देते थै। जब पुलिस ने तंग आकर प्लाईवुड की दीवार बनाई तो वे लोग उस पर खरोंच कर फालतू आकृतियाँ बनाने लगे। भले ही भद्दी आकृतियाँ उस दीवार को गंदा करती हों पर कम से कम अब रोज टूट-फूट के कारण नई दीवार बनाने की आफत से तो मुक्ती मिली। हम जानते हैं कि प्लाईवुड की दीवार को तोड़ना काँच की दीवार को तोड़ने से ज्यादा कठिन नही है, फिर क्यों लोगों ने प्लाईवुड की दीवार नही तोड़ी? बात यह है कि जब हम काँच देखते हैं और बिगाड़ने का मन होता है तो मन में ख्‍याल आता है तोड़ दें। जब हम लकड़ी देखते हैं और बिगाड़ने का मन होता है तो मन में ख्याल आता है कि खरोंच दे। यही उन पदार्थो की अफ्फोर्डेंस हैं को कि उनके मूल गुणों से अलग माना हुआ (perceived) गुण हैं। दरवाजे की अभिकल्पना में और उदाहरण मिलते हैं अफ्फोर्डेंस के - एक स्टील की पट्टी या फिर स्प्रिंग लगी दबने वाली पट्टी की अफ्फोर्डेंस है दबाना, और एक कार जैसे हैंडल (लीवर) और दरवाज़ें की नॉब की अफ्फोर्डेंस है घुमाना। यदि निर्माणकर्ता इन पदार्थों की अफ्फोर्डेंस का सही इस्तेमाल करें तो हमें दरवाज़ा खोलने के सरलतम काम के लिये "पुश-पुल" के निर्देशों की आवश्यकता ना हो।

कई उपकरणों में अत्याधिक सुविधाओं की उपस्तिथी भी उस उपकरण के इस्तेमाल की जटिलता में भागी होती है। आजकल मोबाईल फोन फोन के अलावा व्यक्तिगत डायरी, आलार्म, घड़ी, सरल संदेश लिखने का यंत्र, अंतर्जाल दिखाने वाला, कैमरा, संगीत और चलचित्र दिखाने वाला इत्यादि कई यंत्रों का काम कर रहा है जबकि उसका आकार छोटे से छोटा होता जा रहा है। यही कारण है कि एक बटन दसों बटनों का काम करता है और किसी भी काम के लिये हमें #*345#*A जैसी बटनों की ऊल-जलूल श्रंखला को याद रखना पड़ता है। जब ग्राहक किसी यंत्र को खरीदता है तो वो भी ब्रांड, कीमत व लक्षणों की भरमार देखता है। वो तो जब घर आकर साधारण से उपकरण को इस्तेमाल करने से पहले १०० पन्नो की निर्देश पुस्तिका पढ़ने बैठता है तब उसे उपकरण की उपयोगिता का ख्याल आता है। इस जटिलता में फँसकर अधिकतर उपयोगकर्ता उन सुविधाओं का उपयोग भी नही करते जिनके लिये उन्होनें शुरू में ज्यादा कीमत चुकाई थी। निर्माणकर्ता भी रंग-रूप पर अधिक ध्यान देते हैं और क्योंकि अभिकल्पना विशेषज्ञ के लिये ग्राहक एक कंपनी होती है ना कि अंतिम उपयोगकर्ता उनके बीच तालमेल भी अक्सर नगण्य होता है।

किसी उपकरण की अभिकल्पना में उपयोगकर्ता से गल्ती होने पर होने वाले प्रभावों को भी कम करना चाहिये और जहाँ तक संभव हो पीछे जाने की व्यवस्था होनी चाहिये (reversible error)। कई बार उपयोगकर्ता यंत्र की बुरी परिकल्पना के कारण गल्ती करनें पर खुद को दोष देता है क्योंकि उसे पता है सही क्या करना था। पर यदि आप जान कर भी गल्ती करते हैं तो यंत्र की बुरी परिकल्पना भी उतनी ही जिम्मेदार है जिसने सामान्य उपयोगकर्ता के प्राकृतिक रूप से उपयोग की गल्ती का पहले से ही अंदाजा नही लगाया। गल्ती से बचने के लिये निर्माणकर्ता को परिकल्पना में गल्ती होने से रोकने के लिये ऐसी तरतीब का उपयोग करना चाहिये जिससे एक काम करे बिना दूसरा काम संभव ना हो। उदाहरण के लिये कार चालक को सीट की पेटी पहनना भूलने से रोकने के लिये कई कारों में ये व्यवस्था होती है कि बिना सीट की पेटी पहने कार चालू नही होती या फिर एक बीप बजती रहती है। यही व्यवस्था चालक को बिना चाबी निकाले कार से बाहर निकलने से रोकने के लिये होती है। इन दोनो उदाहरणों में भौतिक बंधनों का उपयोग है। निर्माणकर्ता सांस्कृतिक व तार्किक बंधनों का उपयोग कर गल्ती की संभावना को कम कर सकते हैं।

कार चालक को सीट की पेटी पहनना भूलने से रोकने के लिये बिना सीट की पेटी पहने कार चालू नही होतीअगर आप भी ये सोचकर परेशान रहते हैं कि क्यों आप नल के घुमाने की दिशा में जिससे गर्म-ठंडा पानी की आता है (कम से कम अमरीका में) में भूल कर बैठते हैं या फिर किसी बड़े हॉल में लाईटें जलाने के लिये कईयों बटनों से प्रयास करने के बाद सफलता मिलती है तो ये पुस्तक अभिकल्पना के उन महत्वपूर्ण किंतु अप्रसिद्ध सिद्दातों में मनोरंजक ढंग से व उदाहरणों से भरा नज़रिया प्रस्तुत करती है।

अंत में एक पहेली दिमाग की कसरत के लिये! अन्य जगहों की तो नही कह सकता पर अमेरिका में बहुमंजिला भवनों मे आग की स्तिथी में भवन खाली करने के लिये (जबकि लिफ्ट का उपयोग वर्जित होता है) सभी तलों से जुड़ी एक सीढ़ी होती है। ये सीढ़ी सामान्य अवस्था में उन लोगों के लिये भी काम आती है जो कि किसी कारण से लिफ्ट नही लेना चाहतें हो या जब लिफ्ट खराब पड़ी हो। कई भवनों में यह सीढ़ी तहखाने तक भी जाती है। हालांकि एक तल से दूसरे तल पर आदमी सीढ़ी से जा सकता है बिना भवन के अंदर जाऐ (सीढ़ी अकसर बाहर की तरफ होती है), जमीनी तल और तहखाने के बीच की सीढ़ी के बीच कई बार लोहे की डंडी लगी होती है जिसकी वजह से - अगर आप लोहे की डंडी को कूदना ना चाहें - आपको जमीनी तल से तहखानें (सीढ़ी द्वारा) जाने के लिये भवन के अंदर आना पड़ेगा। बताऐं ऐसा क्यों? मैं समझ सकता हूँ कि मेरे शब्द ढंग से बात समझाने मैं नाकाम रहें हौं और प्रश्न समझ ना आया हो, विशेषकर उनको जिन्होने ये सुविधा देखी नही है, फिर भी जो समझ जाऐं वो अंदाजा लगा सकते हैं। यहाँ जाकर देखें कि मैं किसकी बात कर रहा हूँ। हल देखने के लिये नीचे के भाग को सेलेक्ट करें माऊस से।

ऐसा इसलिये कि आग की अवस्था में घबराहट के कारण भागता इंसान ये भूल सकता है कि वो जमीनी तल पर पहुँच गया है और तहखानें में भागा जा सकता है। इसको रोकने के लिये जमीनी माले और तहखाने के बीच की सीढ़ी पर जानबूझ कर अवरोध पैदा करा जाता है ताकि भागता इंसान ठिठक के सोचे और समझे और जमीनी तल से बाहर निकल जाये बिना तहखानें में जाये बिना। यह गल्ती रोकने के भौतिक बंधन का उदाहरण है।

जो समर में हो गये अमर


जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रृद्धागीत, धन्यवाद में

जो समर में हो गए अमर...

लौट कर ना आएंगे विजय दिलाने वाले वीर
मेरे गीत अंजली में उनके लिये नयन-नीर
संग फूल-पान के
रंग हैं निशान के
शूर-वीर आन के

विजय के फूल खिल रहें हैं, फूल अध-खिले झरे
उनके खून से हमारे खेत-बाग-बन हरे
घ्रुव हैं क्राँति-गान के
सूर्व नव-विहान के
शूर्य-वीर आन के

वो गए कि रह सके, स्वतंत्रता स्वदेश की
विश्व भर में मान्यता हो मुक्ति के संदेश की
प्राण देश-प्राण के
मूर्ति स्वाभिमान के
शूर-वीर आन के

जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रृद्धागीत, धन्यवाद में


Jo Samar Mein Ho G...


लता मंगेश्कर की आवाज़ में यह मधुर गीत डाऊनलोड करें

Wednesday, 14 February, 2007

सैंतीस रूपये का चूना

किसी से खबर मिली थी कि भारत सरकार का संगणक विभाग भारतीय भाषाओं के विस्तार के लिये हिन्दी (व अन्य भाषाओं) में सोफ्टवेयर की सी.डी. भेज रहा है। शौक मैं भी उनके जालस्थल पर पहुँच गया और जबकि मैं उन सोफ्टवेयरों को डाऊनलोड भी कर सकता था फिर भी एक सी.डी. का अनुरोध कर दिया। पता अमरीका वाला डाला और...फिर बात भूल गया। किसने सोचा था कि सरकारी दफ्तर से कुछ मँगाओ तो मिल भी जायेगा वो भी सात समुंदर पार। महीनों के बाद एक दिन सी.डी. यहाँ पहुँच ही गई। वाह जी, बड़ा आश्‍चर्य हुआ। फिर जब डाक टिकट की कीमत देखी तो पहला विचार यही आया कि सरकारी सैंतीस रूपये बिगड़वा दिये मैने!


किसने सोचा था कि सरकारी दफ्तर से कुछ मँगाओ तो मिल भी जायेगा वो भी सात समुंदर पार।

खैर कभी उस सी.डी. के सोफ्टवेयरों का ऊपयोग करूँगा तो, शायद जब अपने घर पर कंप्यूटर लाऊँ माता-पिता के लिये। मेरे लिये तो बरहा ही पर्याप्त है अभी। फिर भी जिन लोगों को मँगाना हो वो कोशिश कर सकते हैं - अगर यहाँ भेज सकते हैं तो निश्चित ही कहीं भी भेज सकते होगें। सी.डी. में हिन्दीभाषी फॉन्ट और कुंजीपटल ड्राईवर्स, ऑफिस (भारतीय), ब्राऊज़र (फायरफॉक्स), आई. एम. (गेम) व ई-मेल सोफ्टवेयर (कोलंबा), शब्दकोष, स्पैल-चैकर, टाईपिंग सिखाने का व लेख से आवाज़ बदलने वाला सोफ्टवेयर इत्यादि हैं।

Tuesday, 13 February, 2007

ब्लॉगर प्रथम से ब्लॉगर द्वितीय

अभी-अभी चिठ्ठे को नये ब्लॉगर पर स्थानांतरित किया है इसलिये अगर आपके आर. एस. एस. फीड रीडर में मेरी प्रविष्टियों का सैलाब आ गया हो तो करबद्ध क्षमाप्रार्थी हूँ।

स्थानांतरण के पश्‍चात जब मैनें अपनी प्रविष्टियों के लेबल के साथ पुनः प्रकाशित किया तो सभी की मौलिक प्रकाशन तिथी गायब हो गयी और नई (आज की) प्रकाशन तिथी के साथ प्रकाशित हुई। हाथ से तारीख बदलनें पर भी कोई प्रभाव ना पढ़ा और अब मेरी सारी की सारी प्रविष्टियाँ १२ फरवरी की दिनांक के साथ छपी हुई हैं। किसी और के साथ ऐसा हुआ क्या? कोई उपाय है क्या मौलिक प्रकाशन तिथियाँ वापस लाने का?